उत्तराखंड में वनाग्नि और अनियमित बारिश बनी बड़ी चुनौती, जलवायु परिवर्तन का असर गहरा

उत्तराखंड में जंगल की आग और औसत से अधिक बारिश एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बनती जा रही है। विशेषज्ञ इसके पीछे जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव को मुख्य कारण मान रहे हैं, जिससे मौसम चक्र में असामान्य बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, सर्दियों में कम बारिश और बर्फबारी के कारण जंगल अत्यधिक शुष्क हो जाते हैं, जिससे आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं। वहीं, जुलाई और अगस्त में औसत से अधिक और कम समय में तेज बारिश होने से भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक नुकसान भी बढ़ रहे हैं।

राज्य में कुल 36,937 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है, जहां हर साल वनाग्नि की घटनाएं सामने आती हैं। वर्ष 2010 से 2025 के बीच 18,074 वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 30 हजार हेक्टेयर से अधिक वन संपदा प्रभावित हुई है।

वन विभाग के अनुसार पौड़ी गढ़वाल, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जिले वनाग्नि के लिहाज से सबसे अधिक संवेदनशील हैं।

मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक ने बताया कि वनाग्नि से पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे आग लगने का खतरा और बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि सर्दियों में कम वर्षा और बर्फबारी के चलते जंगल सूख जाते हैं, जो वनाग्नि के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करते हैं। यह पूरा परिदृश्य जलवायु परिवर्तन से गहराई से जुड़ा हुआ है।