इस्तीफे के बयान पर यू-टर्न, हरीश रावत की सियासत पर उठे सवाल

देहरादून। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के इस्तीफे को लेकर दिए गए बयान और बाद में उससे पीछे हटने को लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे हैं। एक दिन पहले तक रावत की ओर से कहा गया था कि यदि कांग्रेस के भ्रष्टाचार-विरोधी नैरेटिव पर असर पड़ा तो वह पार्टी के पदों से इस्तीफा दे देंगे। अब उन्होंने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उनके इस बदले रुख को लेकर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं।

आलोचकों का कहना है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बाद इस्तीफे की बात करना और बाद में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने पर अपने बयान से पीछे हटना जवाबदेही के बजाय राजनीतिक रणनीति अधिक प्रतीत होती है। हालांकि, रावत समर्थक इसे राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में लिया गया फैसला बता सकते हैं।

उत्तराखंड कांग्रेस को लंबे समय तक दिशा देने वाले वरिष्ठ नेताओं में हरीश रावत की प्रमुख भूमिका रही है। ऐसे में पार्टी की गुटबाजी, संगठन की कमजोरी और घटते राजनीतिक प्रभाव को लेकर उठ रहे सवालों के बीच उनके नेतृत्व और जिम्मेदारी पर भी चर्चा होना स्वाभाविक है।

राजनीति में बयान देना आसान है, लेकिन अपने बयान पर कायम रहना चुनौतीपूर्ण होता है। यही वजह है कि रावत के बदले रुख को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि यदि इस्तीफा देना नहीं था तो इसकी घोषणा क्यों की गई?

अब राजनीतिक बहस केवल इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी सामने है कि वरिष्ठ नेतृत्व पार्टी की मौजूदा स्थिति की जिम्मेदारी से कितना बच सकता है। बयान बदलना राजनीतिक अधिकार हो सकता है, लेकिन जनता के बीच किसी नेता की विश्वसनीयता उसके बयानों और फैसलों में निरंतरता से ही तय होती है।