

देहरादून। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। राज्य में वन्यजीवों की बढ़ती संख्या और जंगलों से सटे आबादी वाले क्षेत्रों में बढ़ती गतिविधियों के कारण संघर्ष की घटनाएं चिंता का विषय बन गई हैं। हाल के आंकड़ों के अनुसार राज्य में भालुओं की संख्या करीब 3,200 है, जबकि तेंदुओं की संख्या 2,276, हाथियों की संख्या 2,026 और बाघों की अनुमानित संख्या 560 है। इनमें से करीब 260 बाघ कॉर्बेट टाइगर रिजर्व क्षेत्र में पाए जाते हैं।
यह जानकारी मूल रूप से चमोली जिले के निवासी और मिजोरम विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्रोफेसर तथा स्कूल ऑफ अर्थ साइंसेज एंड नेचुरल रिसोर्स मैनेजमेंट के डीन विश्वंभर प्रसाद सती के अध्ययन में सामने आई है। अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष के अलग-अलग जिलों में अलग-अलग कारण और वन्यजीव प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
पौड़ी में तेंदुए, मध्य हिमालय में भालू बने बड़ी चुनौती
जिलेवार आंकड़ों के अनुसार पौड़ी जिले में तेंदुओं की संख्या सबसे अधिक है। वहीं भालू मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं का एक प्रमुख कारण बनकर उभरे हैं। नैनीताल जिले में बाघों और तेंदुओं की अधिक संख्या के कारण संघर्ष की घटनाएं बढ़ती हैं, जिसका एक प्रमुख कारण कॉर्बेट टाइगर रिजर्व की निकटता भी माना जा रहा है।
हरिद्वार में हाथियों की संख्या अधिक है। देहरादून-हरिद्वार रेलवे लाइन पर हाथियों की मौत की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। अध्ययन में इसके पीछे उचित ढंग से डिजाइन किए गए हाथी गलियारों के अभाव को एक प्रमुख कारण बताया गया है। टिहरी जिला भी तेंदुओं और भालुओं के साथ संघर्ष के कारण राज्य के प्रमुख हॉटस्पॉट में शामिल है।
देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी जिलों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में हाथियों का प्रभाव अधिक है। वहीं मध्य हिमालयी क्षेत्रों में भालू प्रमुख संघर्षकारी वन्यजीव हैं। तेंदुए भी संघर्ष की आवृत्ति और मानव हताहतों के मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसके अलावा जंगली सूअर और लंगूर किसानों की खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
25 वर्षों में 954 लोगों की गई जान
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2000 से 2025 तक 25 वर्षों के दौरान मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण उत्तराखंड में करीब 954 लोगों की मृत्यु हुई। यह औसतन लगभग 30 मौतें प्रतिवर्ष है। हालांकि हाल के वर्षों में मानव मृत्यु और घायल होने की घटनाओं में वृद्धि की प्रवृत्ति देखी गई है।
इस अवधि में सबसे अधिक 548 लोगों की मौत तेंदुओं के हमलों से हुई। इसके बाद हाथियों के हमलों से 230, बाघों के हमलों से 106 और भालुओं के हमलों से 70 लोगों की जान गई।
घायलों की संख्या भी चिंता बढ़ाने वाली है। वर्ष 2000 से 2025 के बीच तेंदुओं के हमलों से सबसे अधिक 2,127 लोग घायल हुए। इसके बाद भालुओं के हमलों से 2,013, हाथियों के हमलों से 234 और बाघों के हमलों से 130 लोग घायल हुए।
पिछले छह वर्षों में तेजी से बढ़ा संघर्ष
वर्ष 2020 से 2025 के बीच मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण कुल 438 लोगों की मृत्यु हुई, जबकि 2,335 लोग घायल हुए। इस अवधि में वर्ष 2024 सबसे घातक रहा, जब 84 लोगों की मौत हुई। वर्ष 2022 में भी 82 मौतें दर्ज की गईं।
घायलों की संख्या के मामले में भी वर्ष 2024 सबसे आगे रहा, जब 512 लोग घायल हुए। इसके बाद वर्ष 2025 में 488 लोगों के घायल होने के मामले सामने आए।
अध्ययन में वर्ष 2000 से 2025 की दीर्घकालिक अवधि और वर्ष 2020 से 2025 की हाल की छह वर्षीय अवधि की तुलना करते हुए कहा गया है कि कुल अध्ययन अवधि के लगभग एक-चौथाई समय में ही हाल के वर्षों में मृत्यु और चोटों की दर असंगत रूप से अधिक रही है।
पौड़ी बना मानव-वन्यजीव संघर्ष का प्रमुख हॉटस्पॉट
मानव-वन्यजीव संघर्ष के हॉटस्पॉट जिलों में पौड़ी में मानव मृत्यु की संख्या सबसे अधिक 53 दर्ज की गई। इसके बाद अल्मोड़ा में 47 और टिहरी में 36 लोगों की मौत हुई। चमोली और नैनीताल जिलों में भी 30-30 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई।
वहीं बागेश्वर, ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और चंपावत जिलों में वन्यजीवों के हमलों से मानव मृत्यु की संख्या 20 से कम रही।
अध्ययन के निष्कर्षों से स्पष्ट है कि उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल वन क्षेत्रों तक सीमित समस्या नहीं रह गया है। बढ़ते संघर्ष को देखते हुए वन्यजीव गलियारों के संरक्षण, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, आधुनिक निगरानी व्यवस्था और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के लिए प्रभावी एवं दीर्घकालिक उपायों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
