

देहरादून, उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और एंबुलेंस की पहुंच अब भी अंतिम छोर तक नहीं हो सकी है। ऐसे में प्रदेश की 3,245 सरकारी डोली-पालकियां आज भी मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में अहम सहारा बनी हुई हैं। कई गांवों में सड़क खत्म होने के बाद ग्रामीण मरीजों को तीन से आठ किलोमीटर तक डोली में उठाकर एंबुलेंस तक पहुंचाते हैं। यानी कई जगह एंबुलेंस मरीज के घर तक नहीं पहुंचती, बल्कि मरीज को ही एंबुलेंस तक जाना पड़ता है। पिथौरागढ़ के पातों गांव में घायल महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों ने आठ किलोमीटर तक डोली उठाई। मरथपला में 70 वर्षीय चंचला देवी को लकड़ी और चादर से बनाई डोली के जरिए सड़क तक पहुंचाया गया। बागेश्वर के भद्रकाली में जून 2025 में 81 वर्षीय गिरिश जोशी को करीब तीन किलोमीटर डोली में ले जाने के बाद एंबुलेंस मिल सकी। वहीं पिथौरागढ़ के तड़ेमिया में जून 2026 में मरीज को पांच किलोमीटर तक सड़क योग्य हिस्से तक लाना पड़ा। ग्रामीण कनेक्टिविटी बढ़ने के बावजूद प्रदेश के करीब 1,142 गांव अब भी अंतिम छोर तक मोटर मार्ग से नहीं जुड़े हैं। इनमें कच्ची सड़क या पगडंडी ही आवागमन का साधन है। इसके अलावा 250 से कम आबादी वाली 289 बस्तियों में करीब एक किलोमीटर सड़क की जरूरत बताई गई है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से गर्भवती महिलाओं को सड़क और स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने के लिए 262 नई डोली-पालकियों के लिए 78.60 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इससे साफ है कि पहाड़ के कई इलाकों में सड़क और एंबुलेंस नेटवर्क के विस्तार के बावजूद डोली आज भी स्वास्थ्य सेवा की अंतिम कड़ी बनी हुई है।
