

देहरादून। उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में आने वाले समय में भू-स्खलन से पहले जमीन की हल्की से हल्की हलचल का भी पता लगाया जा सकेगा। यहां तक कि पहाड़ से पत्थर के खिसकने या हिलने की जानकारी भी वैज्ञानिकों को मिल सकेगी। इसके लिए हैदराबाद स्थित भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (इन्कोइस), आईआईआरएस, वाडिया इंस्टीट्यूट समेत संबंधित संस्थान मिलकर काम करेंगे।
इंटरफेरोमीटर तकनीक से आसान होगी निगरानी
इन्कोइस के वैज्ञानिक डॉ. एन. श्रीनिवास राव ने बताया कि भविष्य में इंटरफेरोमीटर तकनीक के माध्यम से इस तरह की निगरानी और अधिक आसान हो जाएगी। इसके लिए इसरो लगातार सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेज रहा है। उन्होंने कहा कि भारत को अमेरिका और चीन की तुलना में मौसम संबंधी अलग तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
डॉ. राव के मुताबिक, अमेरिका और चीन जैसे देशों में डॉप्लर रडार के जरिए बादलों के बरसने का काफी हद तक अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन भारत में मौसम का मिजाज पल-पल बदलता रहता है। हमारे पास आवश्यक तकनीक मौजूद है, लेकिन इसके लिए अधिक संख्या में सैटेलाइट की जरूरत है। पहाड़ी क्षेत्रों में जितने अधिक डॉप्लर रडार लगाए जाएंगे, मौसम की गतिविधियों को समझना उतना ही आसान होगा।
सूक्ष्म हलचल का भी सटीक मापन
इंटरफेरोमीटर तकनीक तरंगों के व्यतिकरण के सिद्धांत पर आधारित अत्यंत सटीक मापन तकनीक है। इसका इस्तेमाल प्रकाश, लेजर या रेडियो तरंगों के माध्यम से बेहद सूक्ष्म दूरी और सतह में होने वाले बदलावों को मापने के लिए किया जाता है। सामान्य तरीकों से जिन बदलावों का पता लगाना मुश्किल होता है, उन्हें भी इस तकनीक से मापा जा सकता है।
24 देशों को सुनामी अलर्ट
डॉ. राव ने बताया कि भारत ने सुनामी जैसी आपदाओं से सीख लेते हुए मजबूत चेतावनी तंत्र विकसित किया है। भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र के माध्यम से भारत के साथ आसपास के करीब 24 देशों को भी सुनामी संबंधी अलर्ट दिए जा रहे हैं। भूकंप और उससे उत्पन्न होने वाली समुद्री लहरों की गतिविधियों पर वैज्ञानिक 24 घंटे निगरानी रखते हैं।
इसके अलावा मछुआरों को समुद्र की परिस्थितियों और मौसम से संबंधित जरूरी जानकारी एसएमएस और ई-मेल के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही है। इससे करीब 10 लाख मछुआरों को समुद्र में जाने और काम करने के दौरान परिस्थितियों की जानकारी हासिल करने में मदद मिल रही है।
