


उत्तराखंड : जब भी देश में चाय की चर्चा होती है तो सबसे पहले दार्जिलिंग और असम का नाम सामने आता है, लेकिन अब उत्तराखंड भी धीरे-धीरे चाय उत्पादन के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। राज्य के 13 जिलों में से 9 जिलों में चाय की खेती की जा रही है और इसकी गुणवत्ता देश की बेहतरीन चायों को टक्कर दे रही है।
वर्तमान में उत्तराखंड में करीब 1500 हेक्टेयर क्षेत्रफल में चाय की खेती हो रही है, जहां हर साल लगभग 7 लाख किलो हरी चाय पत्तियों का उत्पादन किया जाता है। इन पत्तियों से करीब 1.5 लाख किलो पीने योग्य चाय तैयार होती है। अब उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड ने उत्पादन बढ़ाकर 8.5 लाख किलो हरी पत्तियों तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है।

राज्य में चाय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड किसानों को लगातार प्रोत्साहित कर रहा है। बोर्ड किसानों से 40 रुपये प्रति किलो की दर से हरी चाय पत्तियां खरीद रहा है, जिससे किसानों को आर्थिक लाभ मिल रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं।
चाय की पत्तियों को प्रोसेस कर तैयार चाय बनाने के लिए राज्य में पांच फैक्ट्रियां स्थापित की गई हैं। ये फैक्ट्रियां श्यामखेत (घोड़ाखाल), हरी नगरी (बागेश्वर), कौसानी, चंपावत और भटौली (चमोली) में संचालित हो रही हैं। इसके अलावा नैनीताल में मृदा परीक्षण केंद्र भी बनाया गया है, जहां किसान अपनी मिट्टी की जांच कर यह जान सकते हैं कि उनकी भूमि चाय उत्पादन के लिए कितनी उपयुक्त है।
हालांकि उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड फिलहाल घाटे में चल रहा है। श्रमिकों के भुगतान और उत्पादन लागत को देखते हुए सरकार अब चाय बागानों के कार्यों को वीबीजीआरवाई योजना से जोड़ने की तैयारी कर रही है, ताकि किसानों और श्रमिकों को बेहतर सहायता मिल सके।
उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के निदेशक महेंद्र पाल सिंह का कहना है कि उत्तराखंड में उत्पादित चाय अपनी ताजगी, स्वाद और गुणवत्ता के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही है। आने वाले समय में टी टूरिज्म की योजना लागू होने पर यह क्षेत्र किसानों की आर्थिक समृद्धि का बड़ा माध्यम बन सकता है।
