

देहरादून। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने की सरकार की मंशा को झटका लगा है। मदरसा बोर्ड खत्म होने के बाद एक जुलाई को गठित अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से अब तक राज्य के 452 मदरसों में से केवल सात को ही शिक्षा विभाग और प्राधिकरण की मान्यता मिल पाई है। यानी एक महीने से अधिक समय बीतने के बावजूद करीब एक फीसदी मदरसे ही मान्यता हासिल कर सके हैं।
कई मदरसों ने जांच में नहीं दी जानकारी
देहरादून के जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी की ओर से प्राधिकरण को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि कुछ मदरसों ने जांच टीम को जानकारी देने से इनकार कर दिया। वहीं, कुछ मदरसों ने स्पष्ट रूप से शिक्षा विभाग और प्राधिकरण से मान्यता लेने से इनकार किया है। कई संस्थान मान्यता के लिए पत्रावली तैयार करने की बात कह रहे हैं।
आधुनिक शिक्षा से जोड़ना सरकार का उद्देश्य
सरकार का उद्देश्य मदरसों में पढ़ रहे बच्चों को विज्ञान और गणित जैसी आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना है। साथ ही शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाकर अल्पसंख्यक समुदायों के सभी शिक्षण संस्थानों को एक समान प्रशासनिक दायरे में लाने की योजना है। इसमें मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदायों के संस्थान शामिल हैं।
41 मदरसों में अधिकांश ने पूरे नहीं किए मानक
मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त 41 मदरसों में से अधिकांश अभी तक निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर पाए हैं। दूसरी ओर, ऊधमसिंह नगर में मान्यता के लिए शिक्षा विभाग में आवेदन करने वाले सभी 11 मदरसों के आवेदन मानक पूरे नहीं होने के कारण निरस्त कर दिए गए।
हरिद्वार में 18 में से 7 को मिली मान्यता
हरिद्वार जिले में 18 मदरसों ने मान्यता के लिए प्रक्रिया में भाग लिया, जिनमें से सात मदरसों को मान्यता मिल चुकी है। वहीं, देहरादून और नैनीताल में इस संबंध में अभी बैठक नहीं हुई है।
30 सितंबर तक का समय
मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता हासिल करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया है। यह अवधि 30 सितंबर को पूरी हो जाएगी। इसके बाद मानक पूरा नहीं करने वाले मदरसों के खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को रिपोर्ट भेजी जाएगी। ऐसे संस्थानों के सामने इसके बाद दो विकल्प होंगे—मान्यता हासिल करना या फिर वहां पढ़ रहे बच्चों को दूसरे मान्यता प्राप्त संस्थानों में शिफ्ट करना।
