


हरिद्वार। हरिद्वार नगर निगम की विवादित भूमि खरीद का मामला अब उत्तराखंड के सबसे चर्चित प्रशासनिक और वित्तीय विवादों में शामिल हो गया है। करीब 54 करोड़ रुपये में खरीदी गई भूमि को लेकर उठे सवालों ने कई वरिष्ठ अधिकारियों को जांच के दायरे में ला दिया है। विजिलेंस जांच में अनियमितताओं की पुष्टि के बाद सरकार ने कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है।
मामले की शुरुआत सितंबर 2024 में हुई, जब हरिद्वार नगर निगम ने सराय क्षेत्र में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (कूड़ा निस्तारण) परियोजना के लिए भूमि खरीद की प्रक्रिया शुरू की। कुछ ही महीनों में भूमि का मूल्यांकन, अनुमोदन और खरीद प्रक्रिया पूरी कर ली गई तथा करोड़ों रुपये का भुगतान कर रजिस्ट्री करा दी गई। बाद में शिकायतें सामने आईं कि भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य काफी कम था और परियोजना के लिए उसका चयन भी उपयुक्त नहीं था।

शिकायतों के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मामले की जांच के निर्देश दिए। प्रारंभिक जांच में अनियमितताओं के संकेत मिलने पर जून 2025 में दो आईएएस अधिकारियों समेत कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया और विस्तृत जांच की जिम्मेदारी विजिलेंस को सौंपी गई।
करीब एक वर्ष तक चली जांच के दौरान फाइल नोटिंग, मूल्यांकन रिपोर्ट, भुगतान प्रक्रिया, भूमि उपयोग परिवर्तन और अधिकारियों की भूमिका की गहन पड़ताल की गई। 19 जून 2026 को विजिलेंस रिपोर्ट सामने आने के बाद सरकार ने तत्कालीन नगर आयुक्त के खिलाफ सेवा समाप्ति की संस्तुति और तत्कालीन जिलाधिकारी के विरुद्ध गंभीर दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश की।
2022 में तैयार हुई थी भूमि खरीद की पृष्ठभूमि
सूत्रों के अनुसार विवादित भूमि खरीद की पूरी प्रक्रिया की आधारशिला वर्ष 2022 में तत्कालीन जिलाधिकारी विनय शंकर पांडेय के कार्यकाल में रखी गई थी। बाद के वर्षों में प्रस्ताव को आगे बढ़ाते हुए भूमि चयन और खरीद की प्रक्रिया पूरी की गई।
घटनाक्रम एक नजर में
सितंबर 2024
- सराय गांव में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन परियोजना के लिए लगभग 2.307 हेक्टेयर भूमि खरीदने की प्रक्रिया शुरू।
- भूमि डंपिंग यार्ड के निकट स्थित थी तथा कृषि भूमि से व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तन की प्रक्रिया भी की गई।
अक्टूबर-नवंबर 2024
- भूमि का मूल्यांकन कर लगभग 54 करोड़ रुपये में खरीद का सौदा।
- बाद में आरोप लगे कि भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य इससे काफी कम था।
दिसंबर 2024 से अप्रैल 2025
- खरीद प्रक्रिया, मूल्यांकन और अनुमोदन को लेकर शिकायतें सामने आईं।
- नगर निगम और राजस्व विभाग के अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे।
29 मई 2025
- शासन को प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सौंपी गई।
- रिपोर्ट में गंभीर अनियमितताओं और नियमों के उल्लंघन की बात सामने आई।
3 जून 2025
- मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दो आईएएस अधिकारियों सहित कई अधिकारियों को निलंबित किया।
- विजिलेंस जांच के आदेश दिए गए।
- भूमि की रजिस्ट्री निरस्त करने और भुगतान की वसूली की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए गए।
5 जून 2025
- नगर निगम ने विवादित भूमि की रजिस्ट्री निरस्त कराने के लिए अदालत जाने का निर्णय लिया।
- कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू हुई।
11 जून 2025
- विजिलेंस टीम हरिद्वार पहुंची।
- भूमि का स्थलीय निरीक्षण किया गया और संबंधित अधिकारियों के बयान दर्ज किए गए।
जून 2025 से जून 2026
- विजिलेंस द्वारा विस्तृत जांच।
- बैंक रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, मूल्यांकन रिपोर्ट और अनुमोदन प्रक्रिया की पड़ताल।
19 जून 2026
- विजिलेंस जांच में अनियमितताओं की पुष्टि।
- तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी के विरुद्ध सेवा से बर्खास्तगी की संस्तुति।
- तत्कालीन जिलाधिकारी कर्मेंद्र सिंह के खिलाफ मेजर पेनाल्टी की सिफारिश।
- अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश।
जांच में सामने आए प्रमुख आरोप
- डंपिंग यार्ड के पास स्थित अनुपयुक्त भूमि का चयन।
- बाजार मूल्य से अधिक कीमत पर भूमि खरीद।
- भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं।
- मूल्यांकन और अनुमोदन प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी।
- सरकारी धन को करोड़ों रुपये की संभावित क्षति पहुंचाने के आरोप।
अब विजिलेंस रिपोर्ट के आधार पर मामले में आपराधिक मुकदमा दर्ज होने और अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है। यह मामला उत्तराखंड में प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी धन के उपयोग को लेकर एक बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
