वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन में खुलासा: राज्य में बढ़ रहे जानलेवा भूस्खलन

देहरादून। राज्य में जानलेवा भूस्खलनों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यह तथ्य वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के हालिया अध्ययन में सामने आया है। अध्ययन में वर्ष 1868 से 2023 तक दर्ज 64 जानलेवा और रिपोर्टेड भूस्खलनों का विश्लेषण किया गया, जिनमें कुल 1516 लोगों की मृत्यु हुई।

संस्थान ने भूस्खलन के कारण, चट्टानों के प्रकार, ढलान, वर्षा पैटर्न और भूकंपीय गतिविधियों समेत विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन किया है। शोध पत्र हाल ही में इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में वैज्ञानिक यशपाल सुंदरियाल, अनिरुद्ध चौहान, समीक्षा कौशिक और वैज्ञानिक संदीप शामिल रहे।

मेन सेंट्रल थ्रस्ट के आसपास अधिक घटनाएं

अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश भूस्खलन भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) क्षेत्र के आसपास हुए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस क्षेत्र में बार-बार आने वाले छोटे भूकंप चट्टानों को कमजोर कर देते हैं। इससे चट्टानों के जोड़ ढीले हो जाते हैं और बारिश के दौरान पानी इनके भीतर प्रवेश कर टूटन की संभावना बढ़ा देता है।

बारिश और भूजल स्तर का प्रभाव

रिपोर्ट के अनुसार:

  • हल्के भूस्खलन प्रायः 24 घंटे से कम अवधि की वर्षा के दौरान होते हैं।
  • बड़े और गहरे भूस्खलन 48 से 72 घंटे तक लगातार बारिश के बाद होते हैं।
  • बदलते वर्षा पैटर्न और बढ़ते भूजल स्तर से भी घटनाएं प्रभावित हो रही हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि लगभग 67 प्रतिशत जानलेवा भूस्खलन वर्ष 2000 के बाद हुए हैं, जबकि 84 प्रतिशत अत्यधिक वर्षा की घटनाएं भी इसी अवधि में दर्ज की गईं। सर्वाधिक 52 घातक भूस्खलन मानसून (जून से सितंबर) के दौरान हुए। वर्ष 2017 में सबसे अधिक पांच जानलेवा घटनाएं दर्ज की गईं।

नीस और क्वार्टजाइट चट्टानों में अधिक खतरा

वैज्ञानिकों ने पाया कि सबसे अधिक घटनाएं नीस (19) और क्वार्टजाइट (14) चट्टानों वाले क्षेत्रों में हुईं। इसके अलावा लाइमस्टोन वाले पहाड़ी क्षेत्रों में भी भूस्खलन की घटनाएं सामने आईं।

प्रदेश की प्रमुख भूस्खलन त्रासदियां

  • 18 अगस्त 1998: मालपा (जिला पिथौरागढ़) — 210 लोगों की मृत्यु।
  • 1880: नैनीताल — 151 लोगों की मृत्यु।
  • अगस्त 1951: रुद्रप्रयाग जिले के शिवनंदी गांव — 100 मौतें।
  • अगस्त 1998: मद्महेश्वर घाटी — 103 लोगों की मृत्यु।
  • जुलाई 1990: नीलकंठ क्षेत्र — 100 लोगों की मृत्यु।

अध्ययन से स्पष्ट है कि भूकंपीय गतिविधियों, जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय संरचना के संयुक्त प्रभाव से राज्य में भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक आधार पर पूर्व चेतावनी तंत्र और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर आपदा प्रबंधन को और मजबूत करने की आवश्यकता है।